भगवान बुद्ध के समय के बाद भारत में हिन्दू एवं जैन, चीन में कन्फ्यूशियस तथा ईरान में जरथुस्त्र विचारधारा का बोलबाला था। अवशेष पूरी दुनिया में ग्रीस को छोड़कर लगभग विचारशून्य ही थी। ईसा मसीह के जन्म के पूर्व बौद्ध धर्म की गूंज जेरुशलम तक पहुंच चुकी थी। ईसा पूर्व की 6ठी शताब्दी में ही बौद्ध धर्म का पूर्ण उत्थान हो चुका था। दुनिया का सबसे  सुव्यस्थित धर्म बौद्ध धर्म ही था और आज भी जिन देशों ने इस धर्म को स्वीकार किया है उनका पूरी दुनिया पर राज है। यानिके ऐसे देशों की तकनीकि का पूरे संसार में डंगा बोल रहा है। पहली बार भगवान महावीर और बुद्ध ने धर्म को एक व्यवस्था दी थी। बौद्ध धर्म को मगध नरेश महान सम्राट अशोक ने इसे पूरी दुनिया में फैलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। अशोक महान के काल में ही बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को लांघकर दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा था। चीन, श्रीलंका और विश्व के पूर्व में अशोक महान के शासनकाल में बौद्ध धर्म स्थापित हो चुका था। वहीं कुषाण शासक कनिष्क के काल में तो यह और द्रुत गति से स्थापित हुआ और संपूर्ण एशिया पर छा गया। इतिहासकारों अनुसार अरब और मध्य एशिया में बौद्ध धर्म को स्थापित करने का श्रेय कनिष्क को ही जाता है। कनिष्क के काल में चैथी और अंतिम बौद्ध परिषद हुई थी। इस परिषद का उल्लेख ह्वेनसांग व तिब्बत निवासी तारानाथ ने अपनी पुस्तकों में किया है। नागसेन व मिलिंद के प्रसिद्ध वार्तालाप से अनुमान होता है कि ग्रीक शासक मिनांडर मिलिंद ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। इसके बाद तत्कालीन ग्रीक साम्राज्य भी बौद्ध धर्म के प्रभाव में आ गया था। यानी बौद्ध धर्म भारत से चलकर पूर्व में तिब्बत, चीन, जापान, बर्मा, जावा, लंका और सुमात्रा तक फैला। जहां आज भी विद्यमान है तो दूसरी ओर पश्चिम व मध्य एशिया से होते हुए अरब और ग्रीक तक फैल गया। गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद उनकी मूर्तियां बनाने के दौर चला। उनकी खड़ी आकृति के अलावा उनके जन्म जन्मांतर की कथाओं वाली मूर्तियां पूरे पश्चिमी व मध्य एशिया में निर्मित हुईं। इसमें मथुरा और गांधार शैली में विकसित और ईरानी कलाकारों द्वारा बनाई गई मूर्तियां अफगानिस्तान, ईरान और कहते हैं कि अरब के केंद्र मक्का तक विस्तृत होती चली गईं। बौद्धकाल में विद्यालय की शिक्षा अपने चरमोत्कर्ष पर थी। गुरुकुलों के ही विकसित रूप थे बड़े-बड़े महाविद्यालय। बौद्धकाल से हर्षवर्धन के काल तक विश्व के लोग भारत में शिक्षा लेने आते थे। तक्षशिला को विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय माना जाता है। इसमें आचार्य चाणक्य और पाणिनी ने शिक्षा प्राप्त की थी। तक्षशिला शहर प्राचीन भारत में गांधार जनपद की राजधानी और एशिया में शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। तभी तो हमारा देश विश्वगुरू कहा जाता था। इसमें चीन, सीरिया, ग्रीस और बेबिलोनिया के छात्र पढ़ते थे। विश्व का सर्वप्राचीन विश्वविद्यालय था। कहते हैं कि पाटलीपुत्र से तक्षशिला जाने वाला मुख्य व्यापारिक मार्ग मथुरा से गुजरता था। 
परंतु इसे हम विडंबना ही कहेंगे कि आज जब हमारे देश में अनगिनत शिक्षण, संस्थाएं और विश्वविद्यालय खुले हुए हैं और हमारी सरकार उन पर करोड़ों पैसा पानी की तरह बहा रही है परंतु शिक्षा और गुणवत्ता के नाम पर वह संस्कृति शिक्षा हमसे लाखों कोसों दूर हैं जिसके हम हकदार हैं। फिर भी आज हम विश्वगुरू नहीं बन सकते क्योंकि कहीं न कहीं कुछ तो खोट है। सिर्फ सुनने भर ही रह गया है कि हम कभी शिक्षा क्षेत्र में सर्वोपरि रहे। आज देश की यूजीसी ऐसे उच्च शिक्षा बनाने की ओर अग्रसर है कि एक विद्यार्थी एक समय में दस डिग्रियां हासिल कर सकता है। यह बहुत अच्छी बात हो सकती है। परंतु क्या एक समय में दो कार्य हो सकते हैं। यहां एक बात बड़ी सोचनीय है कि यदि डिग्रियां बांटनी ही हैं तो दुकानों पर रखकर बांटियें कम से कम गरीबों का भला तो हो सकेगा जिनके बसकी महंगी शिक्षा लेना पढ़ना उनके बसकी बात नहीं। आप जानते ही हैं कि ज्ञान मिले न मिले परंतु दाम जरूर मिल जायेंगे। वैसे हम सब ऐसी शिक्षा के परिणाम भुगत रहे हैं और भुगतते रहेंगे। क्योंकि यह बात सुनने पढ़ने को मिलती ही है कि किसी चिकित्सालय में अमुख मरीज सही ईलाज मुहैया न होने के कारण उसने दम तोड़ दिया। या यूं कह सकते हैं कि अमूख ब्रिज किसी खराबी के कारण ढह गया और उस घटना में सैंकड़ों लोग हताहत हो गये। या यूं कहें कि भूकंप आने वाला है उससे सावधान हो जाओ। भूकंप आये या नहीं आये परंतु हमारी उच्च तकनीक के कारण प्राकृतिक त्रासदी से बहुत नुकसान हुआ। या यूं कहें किसान को मिलनी चाहिए उच्च तकनीक की किसान उपज उपजाने की परंतु वही ढाक के तीन पात। उसे उच्च तकनीक की कृषि प्रणाली तो मिलती नहीं इसके बदले उसे प्राकृतिक आपदा झेलनी पड़ती है। अब उसे नई कृषि प्रणाली या उच्च कृषि प्रणाली के नाम पर मिलता है खेती की फसल बीमा योजना का लाभ बल्कि मिलनी चाहिए थी नई फसल उगाने की तकनीक जिससे बढ़ती जनसंख्या का पेट भरा जा सके। या यूं कहें कि देश की प्राथमिक शिक्षा को अधिक गुणवत्ता की जरूरत है ही नई तकनीक की शिक्षा मिलनी चाहिए परंतु मिलती है मिड-डे-मिल, यूनिफाॅर्म, जूते-जुराब, बैग, किताब, खाना, दूध, फल, दाल, साग-सब्जी, गेहूं, वजीफा की आवश्यकता है नहीं क्योंकि शायद ही धरती पर ऐसा कोई मां-बाप होंगे जो अपने बच्चों को शिक्षा न दिला पायें। यह सुविधाएं इन्हें मिले न मिले परंतु हमारे रहनुमाओं के पट जरूर भरते हैं। या हमारी एनजीओ जो हर क्षेत्र में फैली पड़ी हैं नाम तो है उनका और काम भी कि स्वंय सहायता समूह या सरकारी योजनाओं को पंक्ति में खड़ा आखिरी व्यक्ति जो इसका हकदार है उसे मिले परंतु हो रहा है कुछ और है। हम सब जानते हुए भी उन्हें अनदेखा करते आ रहे हैं और वैसे समाचार पत्रों, चैनलों, शायद ही देश में ऐसी कोई सड़क होगी जहां लाखांे का विज्ञापन न लगा हो जिसमें ये सारी योजनाए न छपी हों। परंतु आखिरी पंकित में खड़े उस पात्र को उस सुविधा का लाभ नहीं मिल पाता। 
आज हमारा देश डिजिटल तो बन गया यह हम सबके लिये बड़े गौरव की बात है। क्योंकि डिजिटल भारत में सुलभ न्याय तो मिलेगा ही साथ-साथ उन गरीबों को भी न्याय मिलेगा जो उससे वंचित रहते थे। स्वास्थ्य की चिंता मत करिये क्योंकि हमारी सरकार ने हम सबके स्वास्थ्य को लेकर काफी गंभीर है। अब रही रोजगार की बात तो देश में विदेशी कंपनियों की आने की संभावना है जिससे करोड़ों बेरोजगारों रोजगार मिलेगा। यानी अब देश में कोई बेरोजगार नहीं रहेगा। शिक्षा के प्रति हमारी सरकार काफी गंभीर हैं। तभी तो देश के गरीब बच्चों को प्रथम पाठशाला की पढ़ाई डिजिटल तरीके से पढ़ाई जायेगी वह भी कम्प्यूटर प्रणाली के साथ। वैसे हमारे देश में सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को वेशभूषा, मिड-डे-मिल, किताब, फल, दूध, स्कूल बैग, वजीफा तो मिलता है ताकि किसी गरीब का बच्चा अब शिक्षा से वंचित न रहे। यह बात अलग है कि उन्हें शिक्षा मिले न मिले परंतु उनकी देखभाल के साथ-साथ उनका अच्छा स्वास्थ्य रहे तभी वह बच्चा पढ़ेगा-लिखेगा और आगे बढ़ेगा। तभी आज वास्तव में हमारा देश डिजिटल होता जा रहा है। यह बहुत अच्छी बात है। इसी राह से हम फिर से विश्वगुरू बन सकते हैं। - सुदेश वर्मा (वरिष्ठ पत्रकार सुभारती मीडिया लिमिटेड, मेरठ।)
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