हमारे देश भारत में महात्मा बुद्ध, गुरू नानक साहब, भगवान महावीर, संत सिरोमणि रविदास, राजा राम मोहन राय, सांई बाबा, मेसोपोटेमिया और अरब के सूखे रेगिस्तानों में से यदि मूसा ईसा और रसूल जैसे अमृत निर्झर पैदा न होते तो वहां की तपते हुए बालुका में झुलसने कौन जाता। यूरोप के रणक्षेत्र में यदि हमें सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और संत फ्रांसिस जैसे महान् आत्माओं ने जन्म न लिया होता तो वहां कौन जाता। ये ऐसे महान महापुरूष, साधु संत हुए हैं जिन्होंने सारा जीवन मानव कल्याण के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने यह दिखा दिया कि धरती पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य में एक ही आत्मा है, एक ही रसूख है। सबका एक ही ईश्वर, अल्लाह, गाॅड, मसीह है। इन सबने सारे संसार को एक ही तराजू में तोला है। राजा राम मोहन राय ने देश में चली आ रही कुप्रथा सती को समाप्त किया। बाबा साहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने महिलाओं को पढ़ने का अधिकार दिया। उन्हें मनुष्य जाति के साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में बराबर का हक प्रदान किया। 
जी, हां हम बात कर रहे हैं उस महान पुरूष की जो आज पूरे विश्व में अपना परचम लहराये हुए है। इस महापुरूष ने अपना पूरा जीवन गरीबों के साथ-साथ उस जन के लिये समर्पित कर दिया जो सदियों से चली आ रही कुप्रथा का शिकार था। स्त्रियों की मानवीय दशा को उबार पाने के लिये हमारे भारतीय संविधान में विशेष प्रावधान किये हैं। जिस कारण आज महिला वर्ग एक नये मुकाम पर खड़ा है। ऐसा जब है कि प्रत्येक परिवार मां, बहन, बेटी, बहु होती है। यानी धरती पर ऐसा कोई परिवार नहीं है। जहां हम सब न हो। परंतु कुछ हमारे बीच रहने वाले आज ऐसे लोग मिल ही जायेंगे जो आज भी महिलाओं का तिरस्कार करते हैं। आज भी उन्हें खिलौना समझते हैं। जरा सोचिये यदि हमारे संविधान में यह बातें नहीं लिखी होती तो स्त्री वर्ग की क्या दुरदशा होती। हजारों सालों से घोर अन्याय को झेलते हुए स्त्री वर्ग को आज समानता के साथ जीने, पढ़ने-लिखने व रहने का मौलिक अधिकार बाबा साहब अम्बेडकर ने दिया है।  
आप सोच सकते हैं। उस महापुरूष ने कितना बलिदान दिया होगा जब दबे, कुचले गरीब वर्ग को पढ़ने का अधिकार भी नहीं और यहां तक कि कुए पर उसे पानी का भी अधिकार नहीं था। उस महामानव को सत्-सत् नमन्। देश पर कभी मुगलों का सम्राज्य रहा तो दो सौ सालों तक अंगे्रजों का सम्राज्य रहा। हमारे देश के शहीदों ने अपनी जान पर खेलकर देश को आजाद दिलाई। अंगे्रजों से तो हमें मुक्ति काफी संघर्ष करने के पश्चात मिल गयी। परंतु अब हमारे पास अपना देश चलाने के लिये कोई रूपरेखा चाहिए थी। परंतु उस जमाने में अपने आपको महापंडित बताने वाले लोग बहुतों ने जन्म तो लिया था परंतु करोंड़ों की आबादी वाले देश में कोई ऐसा शख्स नहीं था जो देश चलाने के लिये उनके पास कोई प्रारूप या रूपरेखा थी और न ही उसे कोई बनाने में सक्षम था। परंतु हमस ब यह बात भलीभांति जानते हैं कि जब-जब धरती पर गरीबों के साथ अत्याचार बढ़े हैं तब-तब किसी न किसी रूप ने गाॅड ने जन्म लिया है और वह थे बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर जिन्होंने कड़ी मेहनत दिन-रात एक करके दो साल ग्यारह माह अटठारह दिन में अपने देश का संविधान बनाया। जिस पर चलकर हमारा देश आज अपने पैरों पर खड़ा है। 
यहां एक बात बहुत ही सोचनीय है कि एक आम इंसान अपने परिवार के पालन पोषण में अपना सारा जीवन व्यतीत कर देता है। परंतु उस महामानव के बारे में भी जरा सोचकर देखों ऐसे समय में जब गरीबों को पढ़ने तक का अधिकार नहीं था तो आम बात छोड़िए। वह कैसा समय होगा। परंतु बाबा साहब ने अपने पढ़ाई के साथ समाज के हर वर्ग को साथ लेकर उनके उत्थान के बारे में सोचा करते थे। जीवन परंत तक उन्होंने संघर्ष ही किया। उस समय उन्होंने चैदह भाषाओं में पढ़ाई की और हमारा देश आज अपने पैरों पर खड़ा है। उस महामानव ने संविधान भी ऐसा बनाया कि जिसकी तारीफ पूरी दुनिया करती है। परंतु आज ऐसा समय आ गया है कि हम अपने परिवार तक ही सीमित रह गये हैं। जो लोग अपना परिवार तक नहीं संभाल पाते आज वह देश को संभालने की बात करते हैं। बाबा साहब ने एक बात कही थी ‘‘संविधान चाहे कितना अच्छा क्यों न हो जब तक उसे चलाने वाले ठीक नहीं होंगे तो वह संविधान भी खराब साबित होगा। परंतु चाहे संविधान कितना खराब हो तो चलाने वाले यदि ठीक होंगे तो वह ठीक होगा। जो लोग आज अनाप-सनाप बातें बोलते हैं वे अपने गिरेबां में झांककर देखें कि वह अपने परिवार को संभाल नहीं पाये तो देश कैसे संभालेंगे। आज हम सब पढ़ें हुए अपने समाज को कहते हैं क्या ऐसा है पढ़े-लिखे लोगों का समाज जिसमें ऐसी घिनौनी करतूत होती हो कि आज बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं। आज टीवी चैनलों, अखबारों में शायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब हमें सैंकड़ों की तादात में ऐसी खबर पढ़ने को न मिले कि अमूक की आबरू तार-तार कर दी। क्या यही है हमारा समाज। हमें पढ़ाई के साथ-साथ अपने को चेंजिंग भी लानी होगी। बदलना होगा समाज को। क्या ऐसे ही एक अबला के मान को तार-तार किया जायेगा। हम बात करते हैं अरब में सख्त कानून है वहां अपराधियों को सरेराह फांसी पर चढ़ा दिया जाता है। उनकी हम तारीफ करते हैं। परंतु यह क्यों नहीं सोचते कि हमारा संविधान है ऐसा जिसकी तारीफ पूरी दुनिया करती है। उसे जरूरत है आज की ठीक से फोलो करने की न कि बदलने की। आज हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी। वरना सोच को समय अपने आप बदल देता है। हमें अपने अधिकारों के प्रति लड़ना होगा। आप जानते ही हैं कि जब तक एक बच्चा रोता नहीं है तो मां भी दूध नहीं पिलाती है तो यहां बात है अपने अधिकारों की। आज हमें जरूरत है जागने की। यदि अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जायेगी। 
- सुदेश वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, सुभारती मीडिया लिमिटेड, मेरठ। 
(ये लेखक के अपने निजि विचार हैं)
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Sudesh Verma

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