पूरी दुनिया में भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां सैंकड़ों भाषा, धर्म, संप्रदाय के लोग निवास करते हैं। यानिके कल्चर भी अलग-अलग तभी तो अनेकता में एकता है। यहां रहने वाले सदियों से कभी तो मुगलों के गुलाम रहे तो कभी अंगे्रजी शासकों के गुलाब रहे। हजारों साल बाद जाकर देशवासियों के कड़े संघर्ष के बाद आजादी मिली। यह आजादी हमें ऐसे ही नहीं मिली। इसमें न जाने कितने नौजवानों, बच्चे, बुजूर्गो और महिलाओं ने अपना बलिदान दिया। देश में रहने वाले प्रत्येक समुदाय ने आजादी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आज जब सत्तर साल बाद भी जब आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति से पूछते हैं कि क्या तुम्हें आजादी मिली तो उसे पता ही नहीं आजादी क्या चीज होती है। उसे तो बस एक बात का पता है वह यह कि उसे अपने परिवार का पालन पोषण करना है। हां आजादी मिली जरूर। आजादी ऐसे लोगों को मिली जो अंग्रेजों के पिटठू थे। आजाद भारत में आज ऐसे ही रसूख वालों का बोलबाला है। ऐसे लोग आजाद हुए हैं। परंतु एक आखिरी पंक्ति में खड़ा देशवासी वहीं खड़ा है जहां वह सत्तर साल पहले था। आजादी उन उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, पिटठुओं को मिली जो गौरों की चापलूसी करते थे। एक बात बहुत गौर करने वाली यह है कि जो लोग अंगे्रजी शासन में गरीब, दबे, कुचले लोगों पर तब भी अत्याचार करते थे और आज भी कर रहे हैं। वास्तव में ऐसे ही लोगों को ही आजादी मिली है जो ऐसे अपराध करते हैं परंतु उनका रूप, ढंग अलग-अलग है।
हमारा सपना है देश में एक न्याय, एक कर, एक नारी, एक शिक्षा, एक धर्म, बराबर खेती, बराबर फिल्मी दुनिया, बराबर सरकारी सुविधाओं में समान अवसर के साथ-साथ समान रोजगार के अवसर मिलने चाहिएं। यह बहुत ही अच्छा विकल्प हम सब देशवासियों के लिए हो सकता है। परंतु क्या वास्तव में धरातल पर ऐसा हो रहा है। ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा। आज जब तरह-तरह के देश में फेरबदल हो रहे हैं उनका दावा है कि हमारा देश सदियों पुराना जैसा देश बने। अब जरा उनसे यह पूछा जाये कि जिस आधुनिक भारत में हम रह रहे हैं श्वांस ले रहे हैं क्या वे उन संसाधनों या आरामदाह चीजों को त्याग कर देंगे। क्या वे लोग ऐसा कर सकेंगे जो ऐसा बोलते या कहते हैं। यह सब ढिंकौसाला है। इसके मुझे कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हाथी के दांत खाने के कुछ और होते हैं दिखाने के कुछ और। यह सब हमारे रहनुमाआंे पर फिट बैठता है। क्योंकि देश में ऐसा कोई गरीब रहनुमा न रहा होगा जिसके पास सारे संसाधन न हों। और तो और उन्हें आजीवन पैंशन भी मिलती है। अब कहां रह गई सच्ची नेतागिरी अब तो सिर्फ ढाग के तीन पात ही बचें हो शायद न बचे हों। जैसे राजनेता हमारे देश की आजादी मिलने से पहले थे। हम सब अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और साथ ही साथ हम भूलते जा रहे हैं प्राकृतिक देन।
विगत सत्तर सालों मंें दबे, कुचले समाज को जब हजारों सालों से शिक्षा से वंचित रखा गया तो उनका विकास कहां से होता आज भी ऐसे ही समाज शिक्षा से वंचित हैं। चाहे उसमें महिला वर्ग हो या फिर कोई ओर। हमारे पास एक ही लोलीपोप है वह आरक्षण। अब तक इस लोलीपोप से न जाने गरीबों का भला तो हुआ या नहीं हुआ। परंतु पिछले सत्तर सालों से देश में आवाजें उठती आईं हैं कि इस लोलीपोप को हमें भी दो। हम भी इसका स्वाद चखेंगे। हमारे देश की सरकारें भी इसे भुनाती चली आ रही हैं। देश में अपने आपको सबसे ऊंचे कहे जाने वाले लोग स्वर्ण भी इस लोलीपोप का स्वाद चखने लगे हैं। मराठे भी इसी लाइन में लग चुके हैं। बचा-खुचा खुरचन आने वाले चुनावों में काम आयेगा। क्योंकि हमारे रहनुमाओं को कुछ तो मुद्दा चाहिए। इससे अच्छा मुद्दा नागरिकों को बहकावे के लिए तो कोई हो नहीं सकता। क्योंकि वास्तव में जिस आबादी के लिए यह बना था। वह इससे कोसों दूर हैं आज भी। अब जब एक रोटी है और उसके हकदार बना दिये अस्सी लोग तो यहां भी आपस में लड़ाई का लोलीपोप डाल दिया। जो स्थिति देश के आजाद होने से पहले थी आज उसी बेराजगारी को लेकर बड़ी भयानक स्थिति है। अब आप समझ ही सकते हैं हम चाहे किसी भी वर्ग से हों चाहे किसी भी धर्म से हों हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बना सकते हैं कि वह देश में सरकारी या अर्द्धसरकारी नौकरी प्राप्त कर सके। परंतु उस एक पद के लिये पात्र हैं अस्सी लोग तो आप समझ ही सकते हैं आरक्षण कहां रह गया है। सिर्फ लोगों को ठगने के लिये रह गया है। जब एक रोटी के लिये अस्सी भूखे हों तो उस समाज, देश की हालत कैसी होगी। यहां एक बहुत विचारणीय बात यह है कि एक पद के पात्र अस्सी लोग हैं। ऐसे समय में आप ही बता सकते हैं कि एक पद किस व्यक्ति को मिलना चाहिए। उन्हें मिलना चाहिए जो डिग्रियां खरीदकर सौ फीसदी अंक लाने वाले को या फिर एक गरीब का बच्चा दिन-रात पढ़ा उसे अंक मिले अस्सी प्रतिशत। यहां एक काम किया जा सकता है कि एक नौकरी है उसके हिस्से करके आपस मंे बांटा जा सकता है। जैसे मनुष्य जाति को हजारों जातियों में बांट रखा है हमारे देश में। ऐसे लोगों का बस चले तो प्रकृति प्रदत्त जल, वायु, धरती, आकाश को भी हजारों श्रेणियों में बांट सकते हैं। परंतु वहां किसी की नहीं चलती क्योंकि हर प्राणी का आने-जाने का रास्ता कुदरत ने एक जैसा ही बनाया है। वहां इनकी ढोंगियों की रोटियां नहीं सिंकती। क्योंकि जब गाॅड बरसात करता है तो वह यह नहीं अमुख झोपड़ी कालूराम की है अंबानी की या फिर किसी फिल्मी दुनिया की या फिर किसी राजनेता की या फिर किसी गरीब या अमीर की सबको बराबर वर्षा मिलती है। जब धूप निकलती है तो वह सोचकर नहीं निकलती कि यह किसी कबूतर का घर या फिर किसी खरगोश का या फिर किसी गिद का घर है वह सबको बराबर नापती है। अब हम एक बात बहुत गौर करने वाली यह कहते हैं कि सत्य और अटूट है जन्म और मृत्यु यह सबको बराबर मिलती है। चाहे कुमार, बनिया हो, ब्राहा्रण हो या फिर कोई गरीब और अमीर। हां, वास्तव में यदि देश का विकास आप या हम सब चाहते हैं तो सबसे पहले उस गरीब को शिक्षा मिलनी चाहिए जिसका वह हकदार है। जब उसे सही शिक्षा मिल जायेगी तो वह अपना विकास तो करेगा ही साथ-साथ देश का विकास भी करेगा।
आज जो स्थिति देश की है यानी हमारी सरकारों का फोकस होना चाहिए बेरोजगारों को रोजगार मिले, अशिक्षितों को शिक्षा मिले, महिलाओं को सम्मान के साथ आत्मनिर्भर बनाया जा सके। देश की आर्थिक, सामाजिक और व्यापारिक स्थिति ढगमगा रही है। आज बेरोजगारी को लेकर जो समस्या पिछले पैंतालीस सालों में नहीं दिखी वह वर्तमान में है। यानि जब रोजगार, विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य हो की बातें हों तो या फिर हम कह सकते हैं जब-जब देश में आवाजें उठती हैं उन्हें आरक्षण का लोलीपोप थमा दिया जाता है लो आप भी इसका स्वाद ले लो। हम सब भी बड़े धैर्य से उसे स्वीकार कर लेते हैं। हमें यह नहीं मालूम जो लोलीपोप हमें थमाया गया है उसका कोई निहितार्थ नहीं रह गया है। जबकि होना यह चाहिए था आज भी संसद में ऐसे कई बिल पड़े हुए हैं यदि उन पर अमल लाया जाये तो देश में रोजगारी के साथ-साथ बहुत सी दुविधाओं से हम पार पा सकते हैं। परंतु ऐसा होगा नहीं। क्योंकि जब पिछले सत्तर सालों से नहीं हुआ तो अबकी बार ओर। आइये हम सब देशवासियों को भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। जय हिन्द।   

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