पूरी दुनिया में भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां सैंकड़ों भाषा, धर्म, संप्रदाय के लोग निवास करते हैं। यानिके कल्चर भी अलग-अलग तभी तो अनेकता में एकता है। यहां रहने वाले सदियों से कभी तो मुगलों के गुलाम रहे तो कभी अंगे्रजी शासकों के गुलाब रहे। हजारों साल बाद जाकर देशवासियों के कड़े संघर्ष के बाद आजादी मिली। यह आजादी हमें ऐसे ही नहीं मिली। इसमें न जाने कितने नौजवानों, बच्चे, बुजूर्गो और महिलाओं ने अपना बलिदान दिया। देश में रहने वाले प्रत्येक समुदाय ने आजादी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आज जब सत्तर साल बाद भी जब आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति से पूछते हैं कि क्या तुम्हें आजादी मिली तो उसे पता ही नहीं आजादी क्या चीज होती है। उसे तो बस एक बात का पता है वह यह कि उसे अपने परिवार का पालन पोषण करना है। हां आजादी मिली जरूर। आजादी ऐसे लोगों को मिली जो अंग्रेजों के पिटठू थे। आजाद भारत में आज ऐसे ही रसूख वालों का बोलबाला है। ऐसे लोग आजाद हुए हैं। परंतु एक आखिरी पंक्ति में खड़ा देशवासी वहीं खड़ा है जहां वह सत्तर साल पहले था। आजादी उन उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, पिटठुओं को मिली जो गौरों की चापलूसी करते थे। एक बात बहुत गौर करने वाली यह है कि जो लोग अंगे्रजी शासन में गरीब, दबे, कुचले लोगों पर तब भी अत्याचार करते थे और आज भी कर रहे हैं। वास्तव में ऐसे ही लोगों को ही आजादी मिली है जो ऐसे अपराध करते हैं परंतु उनका रूप, ढंग अलग-अलग है।
हमारा सपना है देश में एक न्याय, एक कर, एक नारी, एक शिक्षा, एक धर्म, बराबर खेती, बराबर फिल्मी दुनिया, बराबर सरकारी सुविधाओं में समान अवसर के साथ-साथ समान रोजगार के अवसर मिलने चाहिएं। यह बहुत ही अच्छा विकल्प हम सब देशवासियों के लिए हो सकता है। परंतु क्या वास्तव में धरातल पर ऐसा हो रहा है। ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा। आज जब तरह-तरह के देश में फेरबदल हो रहे हैं उनका दावा है कि हमारा देश सदियों पुराना जैसा देश बने। अब जरा उनसे यह पूछा जाये कि जिस आधुनिक भारत में हम रह रहे हैं श्वांस ले रहे हैं क्या वे उन संसाधनों या आरामदाह चीजों को त्याग कर देंगे। क्या वे लोग ऐसा कर सकेंगे जो ऐसा बोलते या कहते हैं। यह सब ढिंकौसाला है। इसके मुझे कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हाथी के दांत खाने के कुछ और होते हैं दिखाने के कुछ और। यह सब हमारे रहनुमाआंे पर फिट बैठता है। क्योंकि देश में ऐसा कोई गरीब रहनुमा न रहा होगा जिसके पास सारे संसाधन न हों। और तो और उन्हें आजीवन पैंशन भी मिलती है। अब कहां रह गई सच्ची नेतागिरी अब तो सिर्फ ढाग के तीन पात ही बचें हो शायद न बचे हों। जैसे राजनेता हमारे देश की आजादी मिलने से पहले थे। हम सब अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और साथ ही साथ हम भूलते जा रहे हैं प्राकृतिक देन।
विगत सत्तर सालों मंें दबे, कुचले समाज को जब हजारों सालों से शिक्षा से वंचित रखा गया तो उनका विकास कहां से होता आज भी ऐसे ही समाज शिक्षा से वंचित हैं। चाहे उसमें महिला वर्ग हो या फिर कोई ओर। हमारे पास एक ही लोलीपोप है वह आरक्षण। अब तक इस लोलीपोप से न जाने गरीबों का भला तो हुआ या नहीं हुआ। परंतु पिछले सत्तर सालों से देश में आवाजें उठती आईं हैं कि इस लोलीपोप को हमें भी दो। हम भी इसका स्वाद चखेंगे। हमारे देश की सरकारें भी इसे भुनाती चली आ रही हैं। देश में अपने आपको सबसे ऊंचे कहे जाने वाले लोग स्वर्ण भी इस लोलीपोप का स्वाद चखने लगे हैं। मराठे भी इसी लाइन में लग चुके हैं। बचा-खुचा खुरचन आने वाले चुनावों में काम आयेगा। क्योंकि हमारे रहनुमाओं को कुछ तो मुद्दा चाहिए। इससे अच्छा मुद्दा नागरिकों को बहकावे के लिए तो कोई हो नहीं सकता। क्योंकि वास्तव में जिस आबादी के लिए यह बना था। वह इससे कोसों दूर हैं आज भी। अब जब एक रोटी है और उसके हकदार बना दिये अस्सी लोग तो यहां भी आपस में लड़ाई का लोलीपोप डाल दिया। जो स्थिति देश के आजाद होने से पहले थी आज उसी बेराजगारी को लेकर बड़ी भयानक स्थिति है। अब आप समझ ही सकते हैं हम चाहे किसी भी वर्ग से हों चाहे किसी भी धर्म से हों हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बना सकते हैं कि वह देश में सरकारी या अर्द्धसरकारी नौकरी प्राप्त कर सके। परंतु उस एक पद के लिये पात्र हैं अस्सी लोग तो आप समझ ही सकते हैं आरक्षण कहां रह गया है। सिर्फ लोगों को ठगने के लिये रह गया है। जब एक रोटी के लिये अस्सी भूखे हों तो उस समाज, देश की हालत कैसी होगी। यहां एक बहुत विचारणीय बात यह है कि एक पद के पात्र अस्सी लोग हैं। ऐसे समय में आप ही बता सकते हैं कि एक पद किस व्यक्ति को मिलना चाहिए। उन्हें मिलना चाहिए जो डिग्रियां खरीदकर सौ फीसदी अंक लाने वाले को या फिर एक गरीब का बच्चा दिन-रात पढ़ा उसे अंक मिले अस्सी प्रतिशत। यहां एक काम किया जा सकता है कि एक नौकरी है उसके हिस्से करके आपस मंे बांटा जा सकता है। जैसे मनुष्य जाति को हजारों जातियों में बांट रखा है हमारे देश में। ऐसे लोगों का बस चले तो प्रकृति प्रदत्त जल, वायु, धरती, आकाश को भी हजारों श्रेणियों में बांट सकते हैं। परंतु वहां किसी की नहीं चलती क्योंकि हर प्राणी का आने-जाने का रास्ता कुदरत ने एक जैसा ही बनाया है। वहां इनकी ढोंगियों की रोटियां नहीं सिंकती। क्योंकि जब गाॅड बरसात करता है तो वह यह नहीं अमुख झोपड़ी कालूराम की है अंबानी की या फिर किसी फिल्मी दुनिया की या फिर किसी राजनेता की या फिर किसी गरीब या अमीर की सबको बराबर वर्षा मिलती है। जब धूप निकलती है तो वह सोचकर नहीं निकलती कि यह किसी कबूतर का घर या फिर किसी खरगोश का या फिर किसी गिद का घर है वह सबको बराबर नापती है। अब हम एक बात बहुत गौर करने वाली यह कहते हैं कि सत्य और अटूट है जन्म और मृत्यु यह सबको बराबर मिलती है। चाहे कुमार, बनिया हो, ब्राहा्रण हो या फिर कोई गरीब और अमीर। हां, वास्तव में यदि देश का विकास आप या हम सब चाहते हैं तो सबसे पहले उस गरीब को शिक्षा मिलनी चाहिए जिसका वह हकदार है। जब उसे सही शिक्षा मिल जायेगी तो वह अपना विकास तो करेगा ही साथ-साथ देश का विकास भी करेगा।
आज जो स्थिति देश की है यानी हमारी सरकारों का फोकस होना चाहिए बेरोजगारों को रोजगार मिले, अशिक्षितों को शिक्षा मिले, महिलाओं को सम्मान के साथ आत्मनिर्भर बनाया जा सके। देश की आर्थिक, सामाजिक और व्यापारिक स्थिति ढगमगा रही है। आज बेरोजगारी को लेकर जो समस्या पिछले पैंतालीस सालों में नहीं दिखी वह वर्तमान में है। यानि जब रोजगार, विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य हो की बातें हों तो या फिर हम कह सकते हैं जब-जब देश में आवाजें उठती हैं उन्हें आरक्षण का लोलीपोप थमा दिया जाता है लो आप भी इसका स्वाद ले लो। हम सब भी बड़े धैर्य से उसे स्वीकार कर लेते हैं। हमें यह नहीं मालूम जो लोलीपोप हमें थमाया गया है उसका कोई निहितार्थ नहीं रह गया है। जबकि होना यह चाहिए था आज भी संसद में ऐसे कई बिल पड़े हुए हैं यदि उन पर अमल लाया जाये तो देश में रोजगारी के साथ-साथ बहुत सी दुविधाओं से हम पार पा सकते हैं। परंतु ऐसा होगा नहीं। क्योंकि जब पिछले सत्तर सालों से नहीं हुआ तो अबकी बार ओर। आइये हम सब देशवासियों को भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। जय हिन्द।   


अक्सर शराब के समर्थक यह कहते सुने गए हैं कि देवता भी तो शराब पीते थे। सोमरस क्या था] शराब ही तो थी। प्राचीन वैदिक काल में भी सोमरस के रूप में शराब का प्रचलन था या शराब जैसी किसी नशीली वस्तु का उपयोग करते थे देवताA कहीं वे सभी भंग तो नहीं पीते थे जैसा कि शिव के बारे में प्राचलित है कि वे भंग पीते थेवैदिक काल में आचार&विचार की पवित्रता का इतना ध्यान रखा जाता था कि जरा भी कोई इस पवित्रता को भंग करता था उसका बहिष्कार कर दिया जाता था या फिर उसे कठिन प्रायश्चित करने होते थे। यह सामान्य सी बात है कि कोई भी धर्म कैसे शराब पीने और मांस खाने की इजाजत दे सकता है क्योंकि धर्म&अध्यात्म की पुस्तकों में हम जगह जगह पर नशे की निंदा या बुराई सुनते हैंए तब धर्म के रचनाकर और देवता कैसे शराब पी सकते हैंA
रामराज में दूध मिला] कृष्णराज में घी और कलयुग में दारू मिली जरा सोच-समझकर पी। हमें यह बात कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज जो समय चल रहा है वह घोर कलयुग है। वैसे भी आप देख ही रहे हैं कि जिस प्रकार से आज का इंसान प्रकृति के सारे नियम कायदे कानून को ताक पर रखकर सिर्फ अपना भला सोच रहा है। ठीक उसके विपरीत प्रकृति भी समय-समय पर अपना चमत्कार दिखाती है।
चमत्कार भी ऐसे कि मानवजाति को हिलाकर रख देती है। परंतु फिर भी इंसान अपने ठाठबाट के लिये जी जोर से लगा हुआ है। कहने को कहते नहीं थकते कि हम इक्कीसवी सदी की ओर बढ़ रहे हैं। परंतु उन्हें अपना भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है। आज उदाहरण हम सबके सामने है। क्योंकि अभी कुछ महीनों पहले सहारनपुर में सैंकड़ो लोग जहरीली शराब पीकर मौत के काल में समा गये। पड़ताल के नाम पर सिर्फ और सिर्फ जैसा होता आया है आपके सामने है। अब जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिले में जहरीली शराब का सेवन करने से दर्जनों लोग अकाल मौत ने अपने आगोस में ले लिया। कार्रवाई हुई पर क्या ऐसा ही होता रहेगा। यह एक विचारणीय प्रश्न है। वैसे भी हमारी सरकारों को शराब की बिक्री से टैक्स के रूप में 60 फीसदी तक पैसा राजस्व को आता है। परंतु जितना पैसा दारू की बिक्री से राजस्व सरकार को मिलता है उससे कई गुना हमारे सरकारी अस्पतालों में ऐसे मामलों में पीड़ित लोगों के ईलाज पर धन अधिक खर्च होता है। और इससे भी बड़ी बात तो यह है कि जो लोग जहरीली शराब के शिकार होते हैं उनके परिवार का क्या होता होगा। यह एक बड़ा ही सोचनीय प्रश्न है। इससे तो यही बात साबित होती है। वाकई हमारी सरकारें गरीब लोगों का कितना ख्याल रखती हैं। तभी तो आपको देखने को मिल ही जायेंगे कि जो संसाधन एक मानव जाति के विकास के लिये होने चाहिएं उनसे कई गुना ज्यादा हर चैराहे पर मदीरा के स्टेशन आपको मिल ही जायेंगे। यानी इन्हें लेने के लिये किसी भी ग्राहक को लाइन में लगने की आवश्यकता नहीं होगी।
        परंतु यह हमारे देश का दुर्भाग्य होगा कि जिस तरह से हर चैराहे पर मदीरा की दुकानें मिल जायेंगी। लेकिन यदि किसी भी जनमानस को मंदिर] गुरूद्वारा] मस्जिद] चर्च या अन्य किसी धार्मिक स्थल पर जाना हो तो वह घर से कोसों दूर हो सकता है। जहां भीड़ होनी चाहिए वहां आपको भीड़ नहीं मिलेगी। और तो और यदि आप गरीब परिवार से ताल्लुक रखते है। तो अपने बच्चे की पढ़ाई के लिये आपको दूर किसी स्कूल में जाना पड़ेगा। यानिके देश के हर गरीब बस्ती] आबादी के पास इतने शराब के ठेके मिलेंगे कि आपको इनके लिये भटकना न पड़े। और तो और देश में अभी ऐसी सुविधाएं मिलने लगने की संभावना है कि आपको ऐसी वस्तुओं की होम डिलिवरी मिल सकती है। क्योंकि अब हम आधुनिक भारत में प्रवेश कर रहे हैं। यहां एक बात तो बिल्कुल साफ है कि देश की गरीब जनता को शिक्षास्वास्थ्य] रोजगार को लेकर आने वाले दिनों में रोने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि जब शायद कोई ऐसा दिन जाता होगा जब देश में जहरीली शराब पीने से कोई गरीब न गया हो। वैसे भी हमारे देश के गरीबी जनता के आंकड़े कम होते जा रहे हैं। यानिके अगली-पिछली सरकारों ने अपना ध्यान केंद्रीत कर देश की गरीबी दूर की है। यदि ऐसा ही हाल रहा तो वास्तव में ही देश की गरीबी अपने आप ही दूर जायेगी। यहां एक मुहावरा बिल्कुल शाश्वत होता दिखा रहा है कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसूरी।
सुदेश वर्मावरिष्ठ पत्रकार
लेखक के ये अपने निजि विचार हैं

भगवान बुद्ध के समय के बाद भारत में हिन्दू एवं जैन, चीन में कन्फ्यूशियस तथा ईरान में जरथुस्त्र विचारधारा का बोलबाला था। अवशेष पूरी दुनिया में ग्रीस को छोड़कर लगभग विचारशून्य ही थी। ईसा मसीह के जन्म के पूर्व बौद्ध धर्म की गूंज जेरुशलम तक पहुंच चुकी थी। ईसा पूर्व की 6ठी शताब्दी में ही बौद्ध धर्म का पूर्ण उत्थान हो चुका था। दुनिया का सबसे  सुव्यस्थित धर्म बौद्ध धर्म ही था और आज भी जिन देशों ने इस धर्म को स्वीकार किया है उनका पूरी दुनिया पर राज है। यानिके ऐसे देशों की तकनीकि का पूरे संसार में डंगा बोल रहा है। पहली बार भगवान महावीर और बुद्ध ने धर्म को एक व्यवस्था दी थी। बौद्ध धर्म को मगध नरेश महान सम्राट अशोक ने इसे पूरी दुनिया में फैलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। अशोक महान के काल में ही बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को लांघकर दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा था। चीन, श्रीलंका और विश्व के पूर्व में अशोक महान के शासनकाल में बौद्ध धर्म स्थापित हो चुका था। वहीं कुषाण शासक कनिष्क के काल में तो यह और द्रुत गति से स्थापित हुआ और संपूर्ण एशिया पर छा गया। इतिहासकारों अनुसार अरब और मध्य एशिया में बौद्ध धर्म को स्थापित करने का श्रेय कनिष्क को ही जाता है। कनिष्क के काल में चैथी और अंतिम बौद्ध परिषद हुई थी। इस परिषद का उल्लेख ह्वेनसांग व तिब्बत निवासी तारानाथ ने अपनी पुस्तकों में किया है। नागसेन व मिलिंद के प्रसिद्ध वार्तालाप से अनुमान होता है कि ग्रीक शासक मिनांडर मिलिंद ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। इसके बाद तत्कालीन ग्रीक साम्राज्य भी बौद्ध धर्म के प्रभाव में आ गया था। यानी बौद्ध धर्म भारत से चलकर पूर्व में तिब्बत, चीन, जापान, बर्मा, जावा, लंका और सुमात्रा तक फैला। जहां आज भी विद्यमान है तो दूसरी ओर पश्चिम व मध्य एशिया से होते हुए अरब और ग्रीक तक फैल गया। गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद उनकी मूर्तियां बनाने के दौर चला। उनकी खड़ी आकृति के अलावा उनके जन्म जन्मांतर की कथाओं वाली मूर्तियां पूरे पश्चिमी व मध्य एशिया में निर्मित हुईं। इसमें मथुरा और गांधार शैली में विकसित और ईरानी कलाकारों द्वारा बनाई गई मूर्तियां अफगानिस्तान, ईरान और कहते हैं कि अरब के केंद्र मक्का तक विस्तृत होती चली गईं। बौद्धकाल में विद्यालय की शिक्षा अपने चरमोत्कर्ष पर थी। गुरुकुलों के ही विकसित रूप थे बड़े-बड़े महाविद्यालय। बौद्धकाल से हर्षवर्धन के काल तक विश्व के लोग भारत में शिक्षा लेने आते थे। तक्षशिला को विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय माना जाता है। इसमें आचार्य चाणक्य और पाणिनी ने शिक्षा प्राप्त की थी। तक्षशिला शहर प्राचीन भारत में गांधार जनपद की राजधानी और एशिया में शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। तभी तो हमारा देश विश्वगुरू कहा जाता था। इसमें चीन, सीरिया, ग्रीस और बेबिलोनिया के छात्र पढ़ते थे। विश्व का सर्वप्राचीन विश्वविद्यालय था। कहते हैं कि पाटलीपुत्र से तक्षशिला जाने वाला मुख्य व्यापारिक मार्ग मथुरा से गुजरता था। 
परंतु इसे हम विडंबना ही कहेंगे कि आज जब हमारे देश में अनगिनत शिक्षण, संस्थाएं और विश्वविद्यालय खुले हुए हैं और हमारी सरकार उन पर करोड़ों पैसा पानी की तरह बहा रही है परंतु शिक्षा और गुणवत्ता के नाम पर वह संस्कृति शिक्षा हमसे लाखों कोसों दूर हैं जिसके हम हकदार हैं। फिर भी आज हम विश्वगुरू नहीं बन सकते क्योंकि कहीं न कहीं कुछ तो खोट है। सिर्फ सुनने भर ही रह गया है कि हम कभी शिक्षा क्षेत्र में सर्वोपरि रहे। आज देश की यूजीसी ऐसे उच्च शिक्षा बनाने की ओर अग्रसर है कि एक विद्यार्थी एक समय में दस डिग्रियां हासिल कर सकता है। यह बहुत अच्छी बात हो सकती है। परंतु क्या एक समय में दो कार्य हो सकते हैं। यहां एक बात बड़ी सोचनीय है कि यदि डिग्रियां बांटनी ही हैं तो दुकानों पर रखकर बांटियें कम से कम गरीबों का भला तो हो सकेगा जिनके बसकी महंगी शिक्षा लेना पढ़ना उनके बसकी बात नहीं। आप जानते ही हैं कि ज्ञान मिले न मिले परंतु दाम जरूर मिल जायेंगे। वैसे हम सब ऐसी शिक्षा के परिणाम भुगत रहे हैं और भुगतते रहेंगे। क्योंकि यह बात सुनने पढ़ने को मिलती ही है कि किसी चिकित्सालय में अमुख मरीज सही ईलाज मुहैया न होने के कारण उसने दम तोड़ दिया। या यूं कह सकते हैं कि अमूख ब्रिज किसी खराबी के कारण ढह गया और उस घटना में सैंकड़ों लोग हताहत हो गये। या यूं कहें कि भूकंप आने वाला है उससे सावधान हो जाओ। भूकंप आये या नहीं आये परंतु हमारी उच्च तकनीक के कारण प्राकृतिक त्रासदी से बहुत नुकसान हुआ। या यूं कहें किसान को मिलनी चाहिए उच्च तकनीक की किसान उपज उपजाने की परंतु वही ढाक के तीन पात। उसे उच्च तकनीक की कृषि प्रणाली तो मिलती नहीं इसके बदले उसे प्राकृतिक आपदा झेलनी पड़ती है। अब उसे नई कृषि प्रणाली या उच्च कृषि प्रणाली के नाम पर मिलता है खेती की फसल बीमा योजना का लाभ बल्कि मिलनी चाहिए थी नई फसल उगाने की तकनीक जिससे बढ़ती जनसंख्या का पेट भरा जा सके। या यूं कहें कि देश की प्राथमिक शिक्षा को अधिक गुणवत्ता की जरूरत है ही नई तकनीक की शिक्षा मिलनी चाहिए परंतु मिलती है मिड-डे-मिल, यूनिफाॅर्म, जूते-जुराब, बैग, किताब, खाना, दूध, फल, दाल, साग-सब्जी, गेहूं, वजीफा की आवश्यकता है नहीं क्योंकि शायद ही धरती पर ऐसा कोई मां-बाप होंगे जो अपने बच्चों को शिक्षा न दिला पायें। यह सुविधाएं इन्हें मिले न मिले परंतु हमारे रहनुमाओं के पट जरूर भरते हैं। या हमारी एनजीओ जो हर क्षेत्र में फैली पड़ी हैं नाम तो है उनका और काम भी कि स्वंय सहायता समूह या सरकारी योजनाओं को पंक्ति में खड़ा आखिरी व्यक्ति जो इसका हकदार है उसे मिले परंतु हो रहा है कुछ और है। हम सब जानते हुए भी उन्हें अनदेखा करते आ रहे हैं और वैसे समाचार पत्रों, चैनलों, शायद ही देश में ऐसी कोई सड़क होगी जहां लाखांे का विज्ञापन न लगा हो जिसमें ये सारी योजनाए न छपी हों। परंतु आखिरी पंकित में खड़े उस पात्र को उस सुविधा का लाभ नहीं मिल पाता। 
आज हमारा देश डिजिटल तो बन गया यह हम सबके लिये बड़े गौरव की बात है। क्योंकि डिजिटल भारत में सुलभ न्याय तो मिलेगा ही साथ-साथ उन गरीबों को भी न्याय मिलेगा जो उससे वंचित रहते थे। स्वास्थ्य की चिंता मत करिये क्योंकि हमारी सरकार ने हम सबके स्वास्थ्य को लेकर काफी गंभीर है। अब रही रोजगार की बात तो देश में विदेशी कंपनियों की आने की संभावना है जिससे करोड़ों बेरोजगारों रोजगार मिलेगा। यानी अब देश में कोई बेरोजगार नहीं रहेगा। शिक्षा के प्रति हमारी सरकार काफी गंभीर हैं। तभी तो देश के गरीब बच्चों को प्रथम पाठशाला की पढ़ाई डिजिटल तरीके से पढ़ाई जायेगी वह भी कम्प्यूटर प्रणाली के साथ। वैसे हमारे देश में सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को वेशभूषा, मिड-डे-मिल, किताब, फल, दूध, स्कूल बैग, वजीफा तो मिलता है ताकि किसी गरीब का बच्चा अब शिक्षा से वंचित न रहे। यह बात अलग है कि उन्हें शिक्षा मिले न मिले परंतु उनकी देखभाल के साथ-साथ उनका अच्छा स्वास्थ्य रहे तभी वह बच्चा पढ़ेगा-लिखेगा और आगे बढ़ेगा। तभी आज वास्तव में हमारा देश डिजिटल होता जा रहा है। यह बहुत अच्छी बात है। इसी राह से हम फिर से विश्वगुरू बन सकते हैं। - सुदेश वर्मा (वरिष्ठ पत्रकार सुभारती मीडिया लिमिटेड, मेरठ।)
  

दिल्ली में संदिग्ध परिस्थितियों में एक नौ साल की बच्ची का शव मिला है। पूर्वी दिल्ली के शकरपुर क्षेत्र में अपने परिवार के साथ एक पेइंग गेस्ट (पीजी) में रहती थी। पीड़िता की पूर्वी दिल्ली के एक अस्पताल में मौत हो गई। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में कथित तौर पर भीड़ ने एक दलित व्यक्ति (28) को चोर समझकर पहले उसके कपड़े उतार दिए और उसे बांधकर पीटा, फिर आग के हवाले कर दिया। बाद में पुलिस ने पीड़ित सुजीत कुमार को लखनऊ के एक अस्पताल में भर्ती कराया। वह 30 प्रतिशत तक जल चुका था। यह युवक रघुपुरवा गांव में कुत्तों के झुंड से बचने के लिए एक घर के बाहर छप्पर में शरण ले ली। स्थानीय निवासी श्रवण कुमार, उमेश, राम लखन और दो और लोगों ने जब उसे घर के पास छिपे देखा तो उसे पकड़ लिया और पीटना शुरू कर दिया जब तक वह अधमरा नहीं हुआ उसे पीटते रहे और बाद में उसके ऊपर तेल छिड़क कर आग लगा दी। वहीं तीसरी घटना मध्य प्रदेश में ग्रामीणों ने मोर की चोरी के आरोप में शख्स की जमकर पिटाई की, इलाज के दौरान हुई मौत हो गई। मध्य प्रदेश के नीमच से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहां ग्रामीणों ने चोरी के आरोप में एक शख्स की जमकर पिटाई कर दी, जिसकी इलााज के दौरान मौत हो गई। वहीं दूसरी ओर आरोपी ओर उसके 3 साथियों पर भी वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम का मामला दर्ज किया गया है। अभी आरोपियों पर आईपीसी की धारा 307 के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसमें हीरालाल की मौत के बाद 302 बढ़ाई जाएगी। ऐसी अनगिनत घटनाएं आज आम हो रही हैं। यह अच्छे समाज की पहचान नहीं हो सकती। 
आज के परिवेश में लगता है समाज सभ्य नहीं रह गया है। तभी तो आजकल भू्रणहत्या आम हो गई हैं। आपको समाचार पत्रों में ऐसी खबरें पढ़ने को मिल ही जायेंगी। कभी कभी तो दिल दहलाने वाली खबर आती है कि किसी ने नवजात बच्ची को कूड़े के ढेर पर मरने के लिए फैंक दिया। जब उस बच्ची को मारना ही था तो ऐसी नोबत क्यों आई। उसे धरती पर आने से पहले ही क्यों मार दिया जाता है। यह उस समाज में हो रहा है जब हम डिजिटल बन गये। यह सब ऐसे सभ्य परिवार वाले ही अधिक करते हैं जो डिजिटल हो गये हैं। बेचारा गरीब तो लोकलाज के चलते ऐसे घिनौने कार्यों से बचता है। क्योंकि वह ईश्वर से डरता है। 
चैथी सोनभद्र में जमीन को लेकर हुए नरसंहार हुआ। जिसमें एक ही परिवार के 10 लोगांे को मौत के घाट उतार दिया। ऐसा बताया गया है कि यह घटना जमीनी रंजिश को लेकर हुई है।  
गौरतलब है कि सोनभद्र के घोरावाल इलाके में ग्राम प्रधान और गोंड आदिवासियों के बीच जमीन के एक टुकड़े को लेकर हुए संघर्ष में 10 लोगों की हत्या हो गई थी जबकि 18 अन्य घायल हो गए थे। दत्त परिवार दबंगों में गिना जाता है। इसके समर्थकों ने कथित रूप से आदिवासियों पर फायरिंग की थी। अब जिस प्रकार से हमारे राजनेता पीड़ितों को न्याय तो मिले या न मिले परंतु अपनी-अपनी रोटियां सेंकनी शुरू कर दी है। यह घटनाएं इस बात की 
कांग्रेस महासचिव और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने प्रियंका गांधी को सोनभद्र जाने से रोकने पर योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कार्रवाई लोकतंत्र का “खुलेआम अपमान” है।
इस घटनाक्रम पर उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने कहा, “सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की ही जिम्मेदारी है कि किसी भी दुखद घटना के बाद वहां उत्तेजना ना फैलने दें। विपक्ष को लोगों में बंधुत्व बढ़ाने में सरकार की मदद करनी चाहिए।” वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने सोनभद्र नरसंहार को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा को कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए सोनभद्र जाने की अनुमति नहीं दी लेकिन बीजेपी पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिम बंगाल के भाटपारा क्षेत्र का दौरा उस समय किया था जब वहां कफ्र्यू लगा हुआ था। ममता बनर्जी ने पत्रकारों से कहा कि सोनभद्र में दलितों पर अत्याचार होने की घटनाएं हुई हैं और अगर कोई इसके खिलाफ आवाज उठा रहा है, तो उन्हें ऐसा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार अपनी विफलता को छिपाने के लिए धारा 144 का सहारा लेकर किसी को सोनभद्र नहीं जाने दे रही है। मायावती ने इस संबंध में ट्वीट किया है। मायावती ने लिखाः “यूपी सरकार जान-माल की सुरक्षा व जनहित के मामले में अपनी विफलता को छिपाने के लिए धारा 144 का सहारा लेकर किसी को सोनभद्र जाने नहीं दे रही है।’’ उन्होंने कहा, ’’’फिर भी उचित समय पर वहां जाकर पीड़ितों की यथासंभव मदद कराने का बसपा विधानमण्डल दल को निर्देश दिया गया है। इस नरसंहार का मुख्य कारण सरकारी लापरवाही है।’’
वहीं दूसरी ओर चाउमीन खिलाने का लालच देकर एक युवक ने साहिबाबाद मंडी में ले जाकर दो बच्चियों से रेप करने की घटना घटित हुई है। ये दोनांे बच्चियां 9 से 10 साल की बताई गई हैं। ये तो वे घटनाएं हैं जो सामने आ जाती है। परंतु इन सबके पीछे ऐसे भी मामले हैं जो पीड़ित लोक-लाज के चलते कानूनी लपड़ों में नहीं पड़ते या यूं कहें कि उनसे कानून कोसों दूर हैं। फिर भी जहां हर सरकार ऐसी घटनाओं की पुनार्रावृत्ति न हो इन पर प्रतिबंध लगे ठोस कानून तो हैं उसका सही प्रकार से पालन किया जाये। यदि समय रहते ऐसे अपराधियों पर अंकुश न लगाया जाये तो वह दिन दूर नहीं जब जनता सड़क पर उतरने को मजबूर होगी और हमारे रहनुमाओं या देश के शुभचिंतकों से हिसाब मांगेगी। यह सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती। क्या मानव समाज की संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं। क्या ऐसे ही हमारा देश डिजिटल इंडिया बनेगा। क्या ऐसे ही होगी हमारी इक्कसवी सदी। क्या ऐसे ही हम वीटो पाॅवर के हकदार होंगे। - सुदेश वर्मा।


यदि देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अधिक हो जाये तो हमारे देश की तकदीर ही बदल जायेगी। आप जानते ही हैं कि आदमी केवल कमाकर ला सकता है। परंतु उस घर-परिवार को सिर्फ एक महिला ही भलीभांति चला सकती है। क्योंकि उसमें धैर्य, पराक्रम और विवेक तथा सहनशक्ति बहुत अधिक होती है। परंतु हम इसे दुर्भाग्य ही कह सकते हैं कि दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र में जब आधी आबादी हर मुकाम पर चार चांद लगा रही है। चाहे वह दुनिया की सबसे बड़ी वायुसेना हो, थल सेना हो यानिके महिला किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से पीछे नहीं हैं फिर भी हमारे देश की आधी आबादी राजनीति से कोसो दूर है। यदि आधी आबादी अपना कर्तव्य समझ जाये तो देश की राजनीति की तस्वीर ही बदल जायेगी। या हम इसे यूं कह सकते हैं कि इसके कम होने के पीछे अब तक समाज में पितृसत्तात्मक ढांचे का मौजूद होना है। यह न सिर्फ़ महिलाओं को राजनीति में आने से हतोत्साहित करता है बल्कि राजनीति के प्रवेश द्वार की बाधाओं की तरह काम करता है। लेकिन राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में महिलाओ की भागीदारी नब्बे के दशक के अंत से उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। वर्तमान समय में यदि इसका आंकड़ा यही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब महिलाओं का हमारे देश की राजनीति में अपना एक वर्चस्व हो सकता है। आज तब महिला मतदाताओं की याद सिर्फ़ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं।
अब ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि चुनावों के विभिन्न स्तर पर महिलाओं की भागीदारी का विश्लेषण किया जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि आज़ादी के सात दशक बाद भी इसमें ग़ैरबराबरी क्यों है। महिलाओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी का विश्लेषण एक पिरामिड मॉडल के रूप में किया जा सकता है। इसमें सबसे ऊपर लोकसभा में उनकी 1952 में मौजूदगी, 22 सीट, को रखा जा सकता है जो 2014 में 61 तक आ गई है यह वृद्धि काफी कम मात्रा में है। लेकिन लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्रा में मौजूद है और लोकसभा में 10 में से नौ सांसद पुरुष हैं। 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4ः थी जो 2014 में क़रीब 11ः है।् लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 20ः से कम है। चुनावों में महिलाओं को टिकट न देने की नीति न सिर्फ़ राष्ट्रीय पार्टियों की है बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी राह पर चल रही हैं और इसकी वजह बताई जाती है उनमें (जीतने की क्षमता) कम होना, जो चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। जबकि भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता का विश्लेषण करने वाले एक विशेषज्ञ के अनुसार यह पिछले तीन चुनावों में बेहतर रही है। 2014 के आम चुनावों में महिलाओं की सफलता 9ः रही है जो पुरुषों की 6ः के मुक़ाबले तीन फ़ीसदी ज़्यादा है। यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के जिताऊ उम्मीदवार के आधार पर ज़्यादा टिकट देने के तर्क को ख़ारिज कर देता है और साथ ही महिला उम्मीदवार न मिलने की बात को निराधार ठहराता है। लोकसभा और फ़ैसले लेने वाली जगहों, जैसे कि मंत्रिमंडल, में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है।
हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक-ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है। 
जो महिलाएं पार्टी के अंदरूनी ढांचे में उपस्थित दर्ज करवाने में कामयाब रही हैं उन्हें भी नेतृत्व के दूसरे दर्जे पर धकेल दिया गया है और वह (शीशे की छतश् को तोड़ पाने में नाकामयाब रही हैं) वह राजनीतिक दलों में नीति और रणनीति के स्तर पर बमुश्किल ही कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और अक्सर उन्हें (महिला मुद्दों) पर निगाह रखने का काम दे दिया जाता है, जिससे कि चुनावों में पार्टी को फ़ायदा मिल सके। नब्बे के दशक में भारत में महिलाओं की चुनावों में भागीदारी में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी देखी गई। वर्तमान में हुए आम चुनावों में आज तक की सबसे ज़्यादा महिला मतदाताओं की भागीदारी देखी गई। चुनाव प्रक्रिया में महिलाओं की भागदारी 1962 के 46.6ः से लगातार बढ़ी है और 2014 में यह 65.7ः हो गई है, हालांकि 2004 के आम चुनावों में 1999 के मुक़ाबले थोड़ी गिरावट देखी गई थी। 1962 के चुनावों में पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच अंतर 16.7ः से घटकर 2014 में 1.5ः हो गया है।

90 के दशक में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को दिए गए 33ः आरक्षण से देश की महिलाओं में पुरुषों की तरह ही सत्ता हासिल करने की भावना विकसित हुई है। इसने एक प्रेरणादायक का काम किया और जो शक्ति प्रदान की उससे महिला मतदाताओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी भी बढ़ी। देश में महिलाओं ने दलितों या मुसलमानों जैसे (किसी ख़ास वर्ग) के रूप में कभी मतदान नहीं किया और न ही किसी राजनीतिक दल ने राज्य या देश के स्तर पर ऐसी कोशिश की कि उन्हें उनसे जुड़े किसी मुद्दे पर आंदोलित किया जाए। पार्टियों को महिला मतदाताओं की याद सिर्फ़ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं। महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही साफ़ हो जाती है। पिछले कुछ चुनावों के प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों पर नज़र डालने से साफ़ हो जाता है कि उनमें लैंगिक मुद्दे प्रमुखता रखते हैं। लेकिन घोषणापत्रों में जो वादे किए जाते हैं वह घिटे-पिटे होते हैं और चुनावी गहमा-गहमी के बाद आसानी से भुला दिए जाते हैं देश में महिला आंदोलन इस वक्त संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के सवालों पर सकारात्मक कार्रवाई को लेकर बंटा हुआ है। यह मूलतः दो बातों पर केंद्रित है. पहला कुल मिलाकर महिला आरक्षण का कोटा बढ़ाने को लेकर और उसमें पिछड़ी जाति की महिलाओं को लेकर और दूसरा अभिजात्यवाद के मुद्दे को लेकर है। जबकि निकाय चुनावों में महिलाओं के लिए सकारात्मक दिशा में काम किया जाना इस वक्त की ज़रूरत है। इसके लिए महिलाओं की चुनावी प्रक्रिया में बाधक बनने वाली चीज़ों को दूर किए जाने की ज़रूरत है और चुनावी राजनीति में मौजूदा दूरियों को पाटने के साथ ही इसे लैंगिक भागीदारी वाला बनाने की ज़रूरत है। कुछ पार्टियां तो महिला आरक्षण का विरोध करती हैं। उनकी करनी और कथनी में जमीन और आसमान का अंतर है। देश की आधी आबादी को उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास है कि वास्तव में अब महिलाओं के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं। - सुदेश वर्मा

हमारे देश भारत में महात्मा बुद्ध, गुरू नानक साहब, भगवान महावीर, संत सिरोमणि रविदास, राजा राम मोहन राय, सांई बाबा, मेसोपोटेमिया और अरब के सूखे रेगिस्तानों में से यदि मूसा ईसा और रसूल जैसे अमृत निर्झर पैदा न होते तो वहां की तपते हुए बालुका में झुलसने कौन जाता। यूरोप के रणक्षेत्र में यदि हमें सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और संत फ्रांसिस जैसे महान् आत्माओं ने जन्म न लिया होता तो वहां कौन जाता। ये ऐसे महान महापुरूष, साधु संत हुए हैं जिन्होंने सारा जीवन मानव कल्याण के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने यह दिखा दिया कि धरती पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य में एक ही आत्मा है, एक ही रसूख है। सबका एक ही ईश्वर, अल्लाह, गाॅड, मसीह है। इन सबने सारे संसार को एक ही तराजू में तोला है। राजा राम मोहन राय ने देश में चली आ रही कुप्रथा सती को समाप्त किया। बाबा साहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने महिलाओं को पढ़ने का अधिकार दिया। उन्हें मनुष्य जाति के साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में बराबर का हक प्रदान किया। 
जी, हां हम बात कर रहे हैं उस महान पुरूष की जो आज पूरे विश्व में अपना परचम लहराये हुए है। इस महापुरूष ने अपना पूरा जीवन गरीबों के साथ-साथ उस जन के लिये समर्पित कर दिया जो सदियों से चली आ रही कुप्रथा का शिकार था। स्त्रियों की मानवीय दशा को उबार पाने के लिये हमारे भारतीय संविधान में विशेष प्रावधान किये हैं। जिस कारण आज महिला वर्ग एक नये मुकाम पर खड़ा है। ऐसा जब है कि प्रत्येक परिवार मां, बहन, बेटी, बहु होती है। यानी धरती पर ऐसा कोई परिवार नहीं है। जहां हम सब न हो। परंतु कुछ हमारे बीच रहने वाले आज ऐसे लोग मिल ही जायेंगे जो आज भी महिलाओं का तिरस्कार करते हैं। आज भी उन्हें खिलौना समझते हैं। जरा सोचिये यदि हमारे संविधान में यह बातें नहीं लिखी होती तो स्त्री वर्ग की क्या दुरदशा होती। हजारों सालों से घोर अन्याय को झेलते हुए स्त्री वर्ग को आज समानता के साथ जीने, पढ़ने-लिखने व रहने का मौलिक अधिकार बाबा साहब अम्बेडकर ने दिया है।  
आप सोच सकते हैं। उस महापुरूष ने कितना बलिदान दिया होगा जब दबे, कुचले गरीब वर्ग को पढ़ने का अधिकार भी नहीं और यहां तक कि कुए पर उसे पानी का भी अधिकार नहीं था। उस महामानव को सत्-सत् नमन्। देश पर कभी मुगलों का सम्राज्य रहा तो दो सौ सालों तक अंगे्रजों का सम्राज्य रहा। हमारे देश के शहीदों ने अपनी जान पर खेलकर देश को आजाद दिलाई। अंगे्रजों से तो हमें मुक्ति काफी संघर्ष करने के पश्चात मिल गयी। परंतु अब हमारे पास अपना देश चलाने के लिये कोई रूपरेखा चाहिए थी। परंतु उस जमाने में अपने आपको महापंडित बताने वाले लोग बहुतों ने जन्म तो लिया था परंतु करोंड़ों की आबादी वाले देश में कोई ऐसा शख्स नहीं था जो देश चलाने के लिये उनके पास कोई प्रारूप या रूपरेखा थी और न ही उसे कोई बनाने में सक्षम था। परंतु हमस ब यह बात भलीभांति जानते हैं कि जब-जब धरती पर गरीबों के साथ अत्याचार बढ़े हैं तब-तब किसी न किसी रूप ने गाॅड ने जन्म लिया है और वह थे बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर जिन्होंने कड़ी मेहनत दिन-रात एक करके दो साल ग्यारह माह अटठारह दिन में अपने देश का संविधान बनाया। जिस पर चलकर हमारा देश आज अपने पैरों पर खड़ा है। 
यहां एक बात बहुत ही सोचनीय है कि एक आम इंसान अपने परिवार के पालन पोषण में अपना सारा जीवन व्यतीत कर देता है। परंतु उस महामानव के बारे में भी जरा सोचकर देखों ऐसे समय में जब गरीबों को पढ़ने तक का अधिकार नहीं था तो आम बात छोड़िए। वह कैसा समय होगा। परंतु बाबा साहब ने अपने पढ़ाई के साथ समाज के हर वर्ग को साथ लेकर उनके उत्थान के बारे में सोचा करते थे। जीवन परंत तक उन्होंने संघर्ष ही किया। उस समय उन्होंने चैदह भाषाओं में पढ़ाई की और हमारा देश आज अपने पैरों पर खड़ा है। उस महामानव ने संविधान भी ऐसा बनाया कि जिसकी तारीफ पूरी दुनिया करती है। परंतु आज ऐसा समय आ गया है कि हम अपने परिवार तक ही सीमित रह गये हैं। जो लोग अपना परिवार तक नहीं संभाल पाते आज वह देश को संभालने की बात करते हैं। बाबा साहब ने एक बात कही थी ‘‘संविधान चाहे कितना अच्छा क्यों न हो जब तक उसे चलाने वाले ठीक नहीं होंगे तो वह संविधान भी खराब साबित होगा। परंतु चाहे संविधान कितना खराब हो तो चलाने वाले यदि ठीक होंगे तो वह ठीक होगा। जो लोग आज अनाप-सनाप बातें बोलते हैं वे अपने गिरेबां में झांककर देखें कि वह अपने परिवार को संभाल नहीं पाये तो देश कैसे संभालेंगे। आज हम सब पढ़ें हुए अपने समाज को कहते हैं क्या ऐसा है पढ़े-लिखे लोगों का समाज जिसमें ऐसी घिनौनी करतूत होती हो कि आज बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं। आज टीवी चैनलों, अखबारों में शायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब हमें सैंकड़ों की तादात में ऐसी खबर पढ़ने को न मिले कि अमूक की आबरू तार-तार कर दी। क्या यही है हमारा समाज। हमें पढ़ाई के साथ-साथ अपने को चेंजिंग भी लानी होगी। बदलना होगा समाज को। क्या ऐसे ही एक अबला के मान को तार-तार किया जायेगा। हम बात करते हैं अरब में सख्त कानून है वहां अपराधियों को सरेराह फांसी पर चढ़ा दिया जाता है। उनकी हम तारीफ करते हैं। परंतु यह क्यों नहीं सोचते कि हमारा संविधान है ऐसा जिसकी तारीफ पूरी दुनिया करती है। उसे जरूरत है आज की ठीक से फोलो करने की न कि बदलने की। आज हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी। वरना सोच को समय अपने आप बदल देता है। हमें अपने अधिकारों के प्रति लड़ना होगा। आप जानते ही हैं कि जब तक एक बच्चा रोता नहीं है तो मां भी दूध नहीं पिलाती है तो यहां बात है अपने अधिकारों की। आज हमें जरूरत है जागने की। यदि अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जायेगी। 
- सुदेश वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, सुभारती मीडिया लिमिटेड, मेरठ। 
(ये लेखक के अपने निजि विचार हैं)

कैसे जरूरत के हिसाब से अंगदान नही होता] अब आप 40 लाख देकर किडनी बदलवा देते हो] अब पैसे दिए हो तो 16 से 25 आयु के आसपास की मजबूत किडनी ही लगाएगा डाक्टर...। आखिर बॉडी पाट्र्स कहाँ से आते है... मुर्दाघरो में पड़ी लाशो से या एक्सीडेंट में मरने वालो से... ये पर्याप्त नही होती और 16 से 25 के लड़के ज्यादातर नशा करके अपने ज्यादातर पार्ट खराब कर चुके होते हैं...। एक जगह है...!! और वो है... हमारे देष भारत में मध्यम दर्जे के परिवार की लड़कियां...!!! ये लड़कियां सिगरेट] गुटखा या शराब का सेवन नहीं करती और शरीर को सुसज्जित रखती हैं। इनके दाँत] हड्डी] आँते] चमडा़] क्रेनियम] लीवर] किडनी] हृदय सब सही और ट्रांसप्लांट के लिए परफेक्ट होता है। इन लडकियों में ^लवबग* औऱ नोकरी का झांसा डालकर इनको कहीं भी ले जाना आसान होता है...। लावबग का मतलब है दिमाग मे प्रेम-प्यार का कीड़ा या नोकरी दिलाने के लिए। इसीलिए दिसम्बर महीने में ही अधिकांष लव प्रोमोटिंग फिल्मे आती हैं। दिसम्बर में फ़िल्मी हीरोटाइप राज] करन] राहुल] टाइप जैसे आशिक घूमना शुरू करते हैं...औऱ नोकरी देने के लिए दोस्त] रिष्तेदार या फ़र्ज़ी  कंपनी के ये बंदे कोई लवर या अपने रिष्तेदार नही बल्कि प्रोफेशनल क्रिमिनल होते हैं। ये पैसे के लिए कुछ भी कर सकते है। हर साल फरवरी के अंत तक मध्यम दर्जे के परिवार की 2 से 4 लाख लडकियां घर से गायब हो जाती हैं। ऐसा सरकारी आंकड़ों से एक रिपोर्ट के माध्यम से खुलाषा हुआ है। जो हमारे समाज के लिए एक बड़ा ही सोचनीय प्रष्न है। 
ऐसा मानना है कि आशिकी में घर से भाग गयी युवती पर ना तो कोई केस बनता है और न ही ऐसे मामलों में उन्हें खोजने की कोई कोषिष ही करता है और अंत में उनका एक बाल तक नही मिलता...जरा सोचिये, ये लड़किया कहाँ पहुँच जाती है? यह हमारे समाज को झकझोर कर देने वाला वाक्य है। अब ऐसे में क्या कोई अभिभावक अपने बच्चों को साथ चैबीसों घंटे तो रह नहीं सकता। क्योंकि उसे अपने परिवार का लालन-पालन भी करना होता है या यूं कह सकते हैं कि हमारे बच्चे अपने घरों से दूर पढ़ाई-लिखाई करने जाते हैं। जो सालों तक हास्टलों में रहकर अपनी पढ़ाई करते हैं। रही बात ऐसे परिवारों की जिनकी बेटियां सिर्फ चारदीवारी में दम घुटने को मजबूर हैं। ऐसे समय में अब मध्यम दर्जे के परिवार की बच्चियां क्या करेंगी। आप अच्छी तरह समझ सकते हो] जैसे ही कोई लवेरिया पकड़ा जाता है] नेता और मिडिया इसमें फुदकना शुरू कर देते है जाति धर्म के नाम पर तरह-तरह की बातें करते हैं। और आखिर में वह परिवार या पलायन कर देता है या फिर परिवार सहित मौत को गले लगा लेते हैं। असल में पहले तो इन बच्चियों का भरपूर शारीरिक शोषण किया जाता है उसके पश्चात हत्या कर दी जाती है और अंग व्यापार से इनकी कमाई होती है। अभी आप गूगल पर सर्च करके अंगो के भाव देखिएगा तो आप भी अष्चर्यचकित हो जायेंगे। फिर अंग प्रत्यारोपण का खर्च देखें तो आप की जुबां दबी की दबी रह जायेगी। क्योंकि एक गरीब परिवार के बसकी उस खर्चे को वहन कर पाना चने चबाना जैसा है। अगर एक लडकी की बॉडी को ढंग से खोले, और प्रत्यारोपण योग्य अंगों की सही कीमत लगे तो कम से कम 5 करोड़ आराम से मिल जाता है ऐसा अनुमान है। 
इसीलिए लव और मानव तस्करी पर ना तो कभी कोई कानून बनता है] और ना ही कोई बनने देता है। क्योंकि ऐसे भेड़िए आपको मिल ही जायेंगे जो इस घिनौने कार्य को अंजाम देते हैं। 
एक बहुत बड़ी बात तो यह कि कभी भी किसी नेता या बिजनेसमेन की बेटी घर से नही भागती और न ही गायब होती है। हमेशा वही लडकिया गायब होती हैं] जिनके परिवार की कोई राजनितिक या क़ानूनी पकड़ नही होती। ऐसा परिवार जो अपने पालन-पोषण में लगे रहते हैं। ऐसे परिवार सरकारी सहायता का सहारा ही एक आसरा है और काफी हद तक यह सहारा ही उनके लिए वरदान साबित होता है। ऐसा एक आंकड़े के अनुसार 2015 में 4000 लडकिया गायब हुई थी] वही 2017 से 2018 तक 7000 लड़कियां गायब हुई थी औऱ ये घटनायें अधिकतर लखनऊ] दिल्ली] मुम्बई जैसे बड़े शहरो में अधिक पाई गई हैं। माना कि हमारी लाड़ली बहिन बेटियां सब जानती हैं] लेकिन क्रिमिनल मार्केटिंग और अंग प्रत्यारोपण के लिए सही और असली अंग आते कहाँ से हैं... ये नही जानती। हम सबको अपनी बहिन बेटियों का ध्यान दें] क्योंकि] जो बाहर हो रहा है] वो हमारे घर में कभी भी हो सकता है औऱ लोगो की सही सलाह ले। किसी के झांसे में न आये।

बहुत पुरानी बात है। हमारे देश में एक बादशाह हुए हैं जिनका नाम था कुतुबुद्दीन ऐबक। जिन्होंने दिल्ली में स्थित कुतुब मिनार बनाई थी। उन्हीं के समय की एक कहानी है। राजा कुतुबुद्दीन ऐबक एक मुगल बादशाह थे। वह अपने राजपाठ को केवल राजकोष से ही चलाते थे। परंतु अपने परिवार का लालन-पालन अपने हाथ से लिखी हुई कुरान की कमाई से ही करते थे। एक बार राजा कई महीनों तक बीमार पड़ गये। उस समय उन्होंने कोई किताब नहीं लिखी। जिससे उनके पास रहने वाले एक नौकर की तनखा तीन-चार महीनों की हो गई। उसी दौरान उस नौकर के घर से खत आया कि आपकी माता जी बीमार हैं उन्होंने आपको बुलाया है। परंतु नौकर की तनखा नहीं मिली थी। इस कारण से वह अपने घर महीनों से नहीं गया था। अब नौकर के सामने बड़ी मुसीबत थी। इधर उसका राजा बीमार और उधर उसकी मां बीमार अब वह करे तो क्या करे। अंत में वह राजा के पास गया और बोला राजा साहब मुझे अपने घर जाना है क्योंकि मेरी माता जी बहुत बीमार हैं घर से खत आया है। मेरी तनखा दे दीजिए। राजा नौकर की बात सुनकर बहुत दुखी हुए। परंतु कुछ कह न सके। अंत में वह उठे और घर के अंदर जाकर रखे दो रूपये उसे लाकर दे दिये। नौकर ने वह पैसे चुपचाप अपने पास रख लिये। अब नौकर सोचने लगा कि राजा के पास इतनी धन दौलत है फिर भी इन्होंने मुझे मेरी सारी तनखा नहीं दी। वह सोच में पड़ गया। परंतु उसे नहीं पता था कि राजा अपनी हाथ से कुरान लिखते थे और उन्हें बाजार में बेचा जाता था उससे मिलने वाले धन से वह अपना परिवार चलाते थे। नौकर दो रू0 लेकर अपने घर को चल दिया।
नौकर को चलते-चलते दिन ढलता चला गया। जैसे ही वह दूसरे नगर में पहुंचा तो वहां एक आदमी अपने सिर पर टोकरा रखकर उसमें अनार आवाज लगाकर बेच रहा था। एक पैसे के दो अनार ले लो। अब नौकर को जैसे ही उसकी आवाज सुनाई दी उसने अनार वाले को अपने पास बुलाया। वह समझ गया था कि हमारे नगर में अनार नहीं मिलते हैं। मैं ये सारा टोकरा भरा हुआ अनार ले सकता हूं। उस नौकर ने अनार से भरा टोकरा खरीद लिया और अपने सिर पर रखकर अपने घर की ओर चल दिया। रास्ते में दूसरा नगर पड़ता था। वहां यह ढंढोरा पीटा जा रहा था कि राजा की रानी बीमार है यदि उसे कोई एक या दो अनार के फल लाकर देगा उसे मुंह मांगा ईनाम दिया जायेगा। उस मनादी को सुनकर नौकर बहुत खुश हुआ। वह बोला मेरे पास बहुत अनार हैं। मुझे राजा के पास ले चलो। मनादी करने वाला युवक उसे अपने राजा के दरबार में ले गया। राजा ने अनार अपनी रानी को खाने के लिये दिया जिसे खाकर रानी ठीक हो गई। राजा ने अनार के बदले उस नौकर को बहुत से सोने चांदी के जेवरात दिये जिससे वह धनवान बन गया और अपने परिवार का पालन पोषण ठीक प्रकार से करने लगा वह अब बहुत सुखी था। कहानी का तात्पर्य यह है कि नेकी की एक रू0 की कमाई आपको वो सुख शांति दे सकती है जिसे आप बेसुमार दौलत होते हुए भी नहीं खरीद सकते।
उपराष्ट्रपति श्री एमवेंकैया नायडु ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता प्राप्त करने के लिए सार्थक प्रयास जारी रखने कीआवश्यकता पर बल दिया है। विश्व में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा के संदर्भ में उपराष्ट्रपति ने इस विषय पर अधिकाधिक विश्वमत कासमर्थन प्राप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के मुद्दे पर विश्व समुदाय से सतत विमर्शजारी रखना जरूरी है।
वे आज नई दिल्ली स्थित अपने निवास पर भारतीय विदेश सेवा के 2018 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित कर रहे थे। विदेशसेवा को अपना कैरियर बनाने के लिएप्रशिक्षु अधिकारियों को शुभकामनाऐं देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह सेवा उन्हें भारत कीमहान सभ्यतासांस्कृतिक समृद्धि तथा यहां विकास की असीम संभावनाओं से वृहत्तर विश्व को परिचित कराने का अवसर प्रदानकरेगी।
उन्होंने कहा कि युवा कूटनीतिज्ञ भविष्य के प्रवक्ताअनुवादक तथा विश्व को भारत की विकास गाथा से परिचित कराने वाले सूत्रधार हैंजो आने वाले वर्षों में भारत और वृहत्तर विश्व के बीच परस्पर सम्मानसौहार्दसमझ तथा साझा विकास के सेतु का निर्माण करेंगे।उपराष्ट्रपति ने विदेश सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों से अपेक्षा की कि वे भविष्य की भू-राजनीति तथा वैश्विक व्यवस्था को परिभाषितकरेंगे।
प्रशिक्षु अधिकारियों के सामने अपने वाली भावी चुनौतियों की चर्चा करते हुए श्री नायडु ने कहा कि विश्व में बढ़ती संरक्षणवादी प्रवृत्ति नेविश्व के साझा विकास के प्रयासों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। विश्व में बढ़ते आतंकवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि कोईभी देश इस विपत्ति से निरापद नहीं है। उन्होंने इस वैश्विक आपदा के विरूद्ध संगठित विश्व के साझा प्रयासों का आह्वाहन किया।उन्होंने आतंकवाद के विरूद्ध भारत के दृढ़ संकल्प की सराहना की और अपेक्षा व्यक्त की कि विश्व शांति के लिए हमारे संकल्पनिष्ठप्रयास जारी रहेंगे।

भगौड़े आर्थिक अपराधियों के भ्रष्ट कृत्यों की चर्चा करते हुए उपराष्ट्रपति ने चिंता व्यक्त की कि कुछ देशों में ये भगौडे आर्थिक अपराधीआसानी से निरापद प्रश्रय पा जाते हैं। उन्होंने वैश्विक अर्थतंत्र तथा वृहत्तर सामाजिक हितों को ऐसे अपराधियों के अनैतिक भ्रष्टाचार सेसंरक्षित रखने के लिए द्विपक्षीयबहुपक्षीय समझौतों तथा प्रत्यर्पण संधियों की निरंतर समीक्षा करने की जरूरत पर बल दिया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि सतत विकास के लिए प्रस्तावित एजेंडा 2030 की सफलता के लिए भारत की सक्रिय साझेदारी अपरिहार्य है।उन्होंने कहा कि आधुनिक समस्याओं के निदान के लिए एक वृहत्तर मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा। श्री नायडु ने कहा कि भारत कीविहंगम विश्व दृष्टि, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के विराट आदर्श से परिभाषित होती रही है। हम सर्वे भवन्तु सुखिन: ’ की प्रार्थना करते हैं।हमारे उदार उदात्त आदर्श हमें वह नैतिक शक्ति देते हैं कि इन विषम वैश्विक परिस्थितियों में भी हम विश्व संवाद को सार्थक रूप सेप्रभावित कर सकते हैं।
श्री नायडु ने कहा कि भारत तेजी से विकास मार्ग पर अग्रसर है तथा विश्व हमारी विकास गाथा को उत्सुकता से देख रहा है। उन्होंने कहाकि हमें विश्व व्यापारनिवेश तथा इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों का भरसक लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने नव प्रशिक्षुओं सेअपेक्षा की कि वे विश्व बाजार की संभावनाओं से लाभ उठाने में भारतीय उद्यमों तथा व्यवसायियों की आगे गढ़ कर सहायत करें तथाभारत में वैश्विक निवेश लाने के प्रयास करें।
हाल में संपन्न 2019 के आम चुनावों की चर्चा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि जनता ने नि:संदेह स्पष्टता के साथ स्थिरता को चुना है।उन्होंने कहा कि मैं आशा करता हूं कि सभी नागरिक हमारी समृद्ध लोकतांत्रिक परंपराओं को और सुदृढ़ करेंगे तथा अपनी साझा ऊर्जाआर्थिक विकास और लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने में लगायेंगे।
उपराष्ट्रपति ने युवा अधिकारियों से आशा व्यक्त की कि वे अपनी जानकारी और कौशल को निरंतर बढ़ायेंगे तथा जिस देश में नियुक्तहोंगे उसके बारे में सभी जानकारी हासिल करेंगे। उपराष्ट्रपति ने अपेक्षा की कि अधिकारी नियुक्ति वाले देश में उपलब्ध संभावनाओं कापता लगायें तथा उन देशों और भारत के बीच रिश्तों को और प्रगाढ़ करें। इस अवसर पर श्री नायडु ने युवा प्रशिक्षु अधिकारियों कोसत्यनिष्ठाविवेकशीलताकर्तव्यनिष्ठा की सलाह दी। उन्होंने अपेक्षा की कि प्रशिक्षु अधिकारी भविष्य मेंशांतिपूर्ण सहअस्तित्वसतत और समन्वेशी विकास जैसे विषयों पर भारत की नीति के मुखर प्रतिनिधि प्रवक्ता बनेंगे।
इस अवसर पर विदेश सेवा संस्थान के डीन श्री जे.एसमुकुलसंयुक्त सचिव श्री राहुल श्रीवास्तव तथा श्री अमरनाथ दूबे सहित अन्यवरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।